Sunday, 7 July 2013

यूं तो मेरी ख़ामोशी भी...

यूं तो मेरी ख़ामोशी भी बहुत कुछ कहती थी,
मगर दिल की दास्तां में ज़ुबां का साथ ज़रूरी था...प्रदीप राघव

Sunday, 23 June 2013

लिखने थे कुछ अक्स उसके,,,
पर क्या करूं ये कलम ही तो है, जो हाथ से फिसल जाती है...
उतारना चाहा उसकी तस्वीर को जिस पत्थर पर...वो पत्थर ही बिखर जाता है..
अब तुझसे और क्या कहूं,,,कहने की कोशिश करूं तो आवाज़ रूठ जाती है....प्रदीप राघव..

Friday, 14 June 2013

आरटीआई से क्यों भागते हैं राजनैतिक दल...?



आरटीआई से क्यों भागते हैं राजनैतिक दल...?

केंद्रीय सूचना आयोग के उस फैसले के बाद जिसमें कहा गया था कि राजनैतिक दलों को आरटाआई के दायरे में आना चाहिए।चूंकि वो सरकार से वित्तीय सहायता प्राप्त करते हैं,के बाद राजनैतिक दलों ने खुलकर इसका विरोध किया।आरटीआई का श्रेय लेने वाली और इसे लागू करने वाली सत्ता में बैठी कांग्रेस पार्टी ने सबसे पहले इसके दायरे में आने से इनकार किया।वहीं दूसरे दल भी इसे गलत ठहरा रहे हैं।उनका कहना है कि हम चुनावों के समय चुनाव आयोग को ब्यौरा दे देते हैं तो फिर इसकी क्या जरूरत है।जेडीयू के मुखिया ने तो यहां तक कहा था कि हम राशन की दुकान नहीं जो खर्चे का ब्यौरा देते रहें।वैसे भाजपा ने प्रत्यक्ष तौर पर इसका विरोध नहीं किया।लेकिन डरते सारे दल हैं।राजनैतिक दलों का मानना है कि वो चुनावों के समय सारे खर्च का ब्यौरा चुनाव आयोग को मुहैया करा देते हैं।लेकिन सवाल यहां ये खड़ा होता है कि देश-विदेश से मिलने वाले चंदे के बारे में आम आदमी को जानकारी क्यों ना हो।जब वो वोट डालने का अधिकार रखते हैं तो उन्हें इसका भी अधिकार होना चाहिए कि जिस राजनीतिक दल को वो वोट देने जा रहे हैं उसके बारे में उन्हें जानने का हक हो।वैसे भी राजनैतिक दल सरकार से वित्तीय सहायता लेते हैं इसका मतलब ये है कि जनता को इस चंदे या खर्च की सारी जानकारी प्राप्त करने का अधिकार है।
इस अधिकार से जनता को वंचित रखकर इसका लाभ उठाया जा रहा है।जैसे कांग्रेस पार्टी का 24 अकबर रोड़ और भाजपा का 11 अशोक रोड़ वाले मुख्यालय का किराया क्रमश 42,817 और 66,896 रूपए है।ऐसा नहीं है कि सिर्फ कांग्रेस और बीजेपी इसका लाभ उठा रहे हैं बल्कि कम्युनिस्ट पार्टी, सपा,बसपा, और एनसीपी जैसे दल भी इस जमात में शामिल हैं।जो सरकार से वित्तीय सहायता लेते हैं।इसका खुलासा आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष चंद अग्रवाल की शिकायत से हुआ जो उन्होंने 6 सितंबर 2011 को सूचना आयोग में दर्ज कराई थी।,जिसमें कांग्रेस और बीजेपी को दिल्ली में सरकारी ज़मीने रियायती दरों पर मुहैया कराने का ज़िक्र है।इसलिए ये दल जनता के प्रति जवाबदेह हैं।वहीं इस संबंध में दूसरी शिकायत 14 मार्च 2011 को अनिल बैरवाल ने सूचना आयोग के समक्ष दर्ज कराई थी जिसमें ये तर्क था कि कांग्रेस,एनसीपी और कम्युनिस्ट पार्टी पर जनता का पैसा खर्च होता है इसलिए ये दल आरटीआई की धारा 2(H) के तहत आते हैं।इन दोनों शिकायतों पर सुनवाई करते हुए मुख्य सूचना आयुक्त ने अपनी अध्यक्षता में 31 जुलाई 2012 को एक बेंच गठित करने का निर्देश दिया था।जिसमें सूचना आयुक्त अन्नपूर्णा दीक्षित और सूचना आयुक्त एम एल शर्मा शामिल थे।मुख्य सूचना आयुक्त सत्येंद्र मिश्र इसके अध्यक्ष थे।जिसके बाद दोनों याचिकाकर्ताओं के द्वारा जुटाई गई जानकारी के आधार पर सूचना आयोग ने फैसला लिया।जिसके तहत राजनीतिक दलों को छह हफ्तों के भीतर सूचना अधिकारी और अपीलीय प्राधिकरण नियुक्त करने का आदेश दिया गया है।इस फैसले के बाद राजनैतिक दलों के चंदे और खर्चे के बारे में आरटीआई  से सूचना प्राप्त की जा सकती है।भले ही इस कानून से भ्रष्टाचार पर पूरी तरह से लगाम ना लग पाए लेकिन भ्रष्टाचारी राजनेताओं के मन में डर जरूर पैदा होगा जिसका लाभ सरकारी खजाने को तो होगा ही साथ ही राजनैतिक दलों की लीपापोती भी जनता के सामने आ जाएगी।


प्रदीप राघव...

Thursday, 6 June 2013

कैसे लगेगी आतंक के लाल गलियारे पर लगाम..?



कैसे लगेगी आतंक के लाल गलियारे पर लगाम...


ज़मीन औऱ हक़ की लड़ाई लड़ने वाले नक्सलियों को आतंकवाद की संज्ञा दी जाने लगी है।दक्षिण में आंध्र प्रदेश से लेकर पूर्व में पश्चिम बंगाल तक फैला लाल गलियारा इन्हीं की देन है।और लाल आतंक फैलाने  वाले ये नक्सली कहीं बाहर दूर-दराज से ना आकर उन्हीं गांवों के निवासी हैं जहां के जंगलों में इन्होंने कब्ज़ा जमाया है जिन्होंने एक आंदोलन शुरू तो किया लेकिन ख़त्म नहीं कर पाए।ना तो इन राज्यों की सरकारों के पास इनका इलाज है और ना ही केंद्र सरकार आज़तक इनका कोई ठोस हल निकाल पाई है।लेकिन इनके द्वारा हो रहे लाल आतंक पर राजनीति भलि-भांति कर लेती है।लेकिन आतंक के लाल गलियारे पर आज़तक कोई ठोस रणनीति नहीं बना पाई है।कुछ राजनेताओं ने पिछले दिनों माना कि सेना ही इनका इलाज हो सकता है।लेकिन सच्चाई इससे परे है।क्योंकि कुछ राज्यों में इनके पास सेना से अच्छे हथियार हैं।जबकि आज़ भी राज्यों की पुलिस ज़ंग लिए हथियार लेकर घूमती है।केंद्रीय गृह सचिव ने पिछले दिनों कहा कि बरसात में इनको घेरेंगे।लेकिन 100-200 या 1000-2000 लोगों को तो सेना ढेर कर सकती है।लेकिन पूरे के पूरे गांवों से सेना कैसे लोहा ले सकती है।ये हालात के मारे ग्रामीण ही तो हैं जिनकी तुलना आज़ आतंकियों से की जा रही है।इनकी ज़मीनों के लिए लड़ाई लड़ने का काम सीमीएम नेता चारू मज़ूमदार और कानू सन्याल ने किया था।पश्चिम बंगाल के नक्सबाड़ी में फैली ये चिंगारी आज आग बनकर बरस रही है।सन् 2004 में पुलिस के आला अधिकारियों के बीच हुई मीटिंग में ही ये बात सामने आई थी कि ये समस्या और भी गंभीर होती जाएगी।नतीजा हमारे सामने है।सबसे पहले ये लोग पुलिस अधिकारियों और सीआरपीएफ जवानों पर अपना गुस्सा फोड़ते थे लेकिन आज हालात बदलते जा रहे हैं।अब नक्सली और ज़्यादा हिंसक होते जा रहे हैं।25 मई को छत्तीसगढ़ में कांग्रेसियों के काफिले पर हमले के बाद देश में फिर से बहस छिड़ गई है कि इस समस्या को जड़ से कैसे ख़त्म किया जाए।एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र को भेजे पत्र में हमलावर नक्सली संगठन ने कांग्रेसी काफिले पर हमले की जिम्मेदारी ली थी और साथ ही ये भी कहा था कि वो सलवा जुड़ूम शुरू करने वाले कांग्रेसी नेता महेंद्र कर्मा को मारना चाहते थे,ड्राईवर और खलासियों को नहीं।इसका साफ-साफ मतलब ये निकलता है कि वो सरकारी नीतियों को पसंद नहीं करते ।सलवा जुड़ूम कार्यकर्ताओं ने जब उनके ख़िलाफ हथियार उठाए तो उन्हें ये हबात अखरने लगी।इसी वज़ह से कर्मा को मौत की नींद सुला दिया गया।लेकिन सवाल ये है कि इस समस्या से कैसे निबटा जाए।सरकार की कमज़ोर नीतियों की वज़ह से लाल गलियारा हिंदुस्तान के और राज्यों की तरफ भी पैर पसार रहा है।इसलिए गंभीर होती जा रही इस नक्सलवाद की समस्या से निबटने के लिए सरकार को पहले इनकी मांगों को सुनना चाहिए,और इनके इतिहास को जानना चाहिए।इनकी मांगों पर अमल करना चाहिए,जिस ज़मीन के लिए ये लड़ाई लड़ रहे हैं वो ज़मीन इनको सौंपनी होगी,उसके बाद ही कोई ठोस हल निकल पाएगा।अगर सरकार ये करने में नाकाम रही तो लाल आतंक का ये मंज़र दिन-ब-दिन और भी ख़ौफनाक होता जाएगा।

प्रदीप राघव..

Wednesday, 24 April 2013

करते थे कल तक जिस राह पे इंतज़ार उनका..
आज़ वो वहां से ख़ामोशी से गुज़र जाते हैं--प्रदीप राघव..

Sunday, 21 April 2013

कट जाती थी राहों से गुजरते-गुजरते यूं ही..
मुहब्बत के सफ़र में काटनी पड़ती है ज़िंदगी....प्रदीप राघव

Sunday, 3 March 2013

चकाचौंध से दूर एक शहर यहां भी..

शहर के मॉल्स और मल्टीप्लेक्स की चकाचौंध से दूर इस अंधेरे गलियारे में भी लोगों का आशियाना होता है।
ये वो लोग हैं जो दो ज़ून की रोटी के जुगाड़ में दर-ब-दर भटकते रहते हैं।इन संकरी गली-कूचों में बने टीन-टप्पर में ये लोग गुजर-बसेरा करने को मज़बूर हैं।बस्ती से बाहर बसे शहरों में रहने वाले राजनेता इन्हें यहां से हटाने की भरसक कोशिश में लगे रहते हैं मगर इन लोगों का जीना भी यहां और मरना भी यहां है।पेट की आग और ग़रीबी इन्हें उस राह पर घसीट ले जाती है जहां ज़िल्लत के सिवाय और कुछ नहीं।इनमें से एकाध कोई छोटा-मोटा कारोबार करने की जुगत में लगा है तो उनमें से ज़्यादातर जुर्म की राह पर चले जाते हैं।

ठीक ऐसा ही हाल इन ग़रीबो के बच्चों का भी है।
मासूम बच्चों को पढाने की बजाय छोटे-मोटे काम-धंधे में लगा देना इन लोगों की मज़बूरी है।कोई चाय-पानी की दुकान पर कप-प्लेट धोने का काम करता है तो कोई पास के नर्सिंग होम्स के बाहर सड़कों पर ग्राहकों को लुभाने के लिए खडा मिल जाता है।
इनमें से ज़्यादातर लड़कियां घर में कांच की चूड़ियां
बनाने का काम करती हैं।बचपन से ही ये मासूम ग़लत 

संगत में पड़ जाते हैं और जुर्म की दुनिया का रास्ता पकड लेते हैं।
हाथ में फ्ल्यूड और सिलोचन नामक पदार्थ लिए ये बालक इस बस्ती के पास वाले उजडे पार्क में झुंड में बैठे मिल जाते हैं जुर्म की दुनिया में कदम रखने की इस पहली सीढी को पार कर ये बच्चे जल्द ही पूर्ण रूप से अपराध की दुनिया के बेताज बादशाह बन जाते हैं।कुछ महत्वपूर्ण आंकडे भी इस बात की पुष्टि करते हैं।पढाई में इस्तेमाल होने वाला फ्ल्यूड इनकी ज़िंदगी में ऐसा ज़हर घोलता है कि ये नशे की लत में पूरा जीवन बिता डालते हैं।और जल्द ही शराब,चरस,गांजा और अफ़ीम का सेवन करने लगते हैं।मलिन बस्तियों में रहने वाले मासूमों के अलावा शहरी वर्ग के भी कुछ बच्चे इस तरह के पदार्थों का नशे के लिए गुपचुप तरीक़े से सेवन करते हैं।शहरी वातावरण इनके कृत्यों पर पर्दा डाल देता है जबकि सामाजिक बहिष्कार का सामना
तो मलिन बस्तियों में रहने वाले मासूमों को करना पडता है।रात तके अंधियारे में ये बालक किसी मुख्य सड़क के किनारे जुर्म की फ़िराक में घूमते दिखाई पड़ते हैं।उम्र का लिहाज इनके कुकर्मों पर पर्दा डाल देता है।पिछले दिनों दिल्ली में हुई गैंगरेप की घटना ने इस मुद्दे को खूब रंग दे दिया।और जुवेनाइल एक्ट में बदलाव की मांग ज़ोर-शोर से उठने लगी।क्योंकि उस भयानक रात लड़की के साथ सबसे ज्यादा दरिंदगी दिखाने वाला भी नाबालिग ही था।

दिल्ली के विवेक विहार और सीमापुरी की झुग्गियों में रहने वाले ग़रीब लोग इस बात को मानते भी हैं लेकिन इसमें भी दोष सरकार का ही है।इनमें से कुछ नई उम्र के लड़के काम की तलाश में इस दोज़ख़ से दुर कभी-कभी रईसों की दुनिया की सैर भी कर आते हैं।इन लोगों के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं होता लेकिन कुछ पाने की जुगत में पूरा जीवन दांव पर लगा देते हैं।सीमापुरी की झुग्गियो में रहने वाले ज्यादातर बच्चे कबाड़ बीनने का काम करते हैं।सवाल पूछने पर पता चलता है कि ये लोग सालों पहले बांग्लादेश से यहां परिवार समेत आ बसे और अब छोटे-मोटे कारोबार में लगकर दिल्ली में ही रहने लगे।इन इलाकों से गुजरने वाली बसों में ये बालक बटुआ मार पिटाई खाते दिखाई दे जाते हैं।अपराध की दुनिया में ये कहां तक कब और कैसे पहुंच गए इस बात का अंदाज़ा इन्हें खुद भी नहीं है।चूहों जैसी चमकीली आंखें और पसलियों पर चिपकी पतली चमड़ी खुद ही इनकी हालत बयां कर देते हैं।

सीमापुरी बॉर्डर से लगी यूपी की कुछ छुटमुट कॉलोनियों में ये बालक अक्सर चुंबकनुमा डंडे से नालियां खखोरते मिल जाते हैं।15-20 रूपयों के सिक्कों से ये अपने खाने-पीने और नशे-पानी का प्रबंध भी कर लेते हैं।शाम के वक़्त शराबी बाप से मां को बचाने के लिए लड़ते-झगड़ते भी दिखते हैं।जिन हाथों में कलम होनी चाहिए उन हाथों में शराब का गिलास लिए नज़दीक के सरकारी ठेके पर जाम छलकाते हुए रात के वक़्त इन्हें देखा जा सकता है।जाति-मज़हब से इनका कोई लेना-देना नहीं पर शराब के लिए अक्सर ये आपस में लड़ जाते हैं।पास की रेलवे लाइन से भी सरकारी संपत्ति चुराते ये पकड़े जाते हैं।बाहरी समाज से इनका कुछ लेना-देना नहीं लेकिन एकाध बालक ऐसा भी है जो सरकारी स्कूल में पढ़ने के लिए मलिन बस्ती से बाहर
अच्छे इलाके में भी जाता है लेकिन पैसों की कमी और लाचारी इन्हें ज़्यादा दिन तक वहां टिकने नहीं देती।कुछ कुची हुई मानसिकता वाले लोगों के द्वारा भी इनका बहिष्कार किया जाता है इन्हीं कारणों से ये ज़िल्लत की ज़िंदगी में जल्द ही वापिस लौट आते हैं और उसी राह को पकड़ लेते हैं जो इनके दोस्तों ने अपना रखी है

दो जू़न की रोटी और रात की शराब का जुगाड़ इन्हें अपराध की राह पर ले जा रहा है।बचपन की मौज-मस्ती से
मख़्मूर ये बच्चे अंधकार में जीने को मज़बूर हैं।और शहर की चकाचौंध से अच्छी इन्हें बस्ती की दोज़ख़ की ज़िंदगी लगने लगी है।इन्हे यहां से बाहर निकालने की कोशिश करने वाले राजनेताओं को ना केवल इन्हें यहां से हटाना चाहिए साथ ही साथ छोटे-मोटे मकान या ज़मीन और रोज़गार का अवसर भी देना चाहिए।इस ज्वलंत मुद्दे पर सरकार को आम आदमी के साथ मिलकर इन मासूमों की मदद करनी होगी।तभी इस समाज को इन कमउम्र अपराधियों से छुटकारा मिलेगा और साथ ही साथ इनके भविष्य को कुछ रोशनी की लौ भी दिखाई देगी।

प्रदीप राघव...